International womens day

International womens day.. तमाम गोष्ठियां आयोजित की जाएंगी, सभाएं होगी जिनमे अधिकांशतः भागीदारी पुरुषों की ही होगी, महिलाएं आज भी रसोई सँभालने में व्यस्त होगी और शायद वही पर रेडियो या टीवी लगाकर नारी सशक्तिकरण पर भाषण सुन रही होंगी। ये सभी काम किसी गाँव या कस्बे में नहीं बल्कि दिल्ली या मुम्बई जैसी मैट्रो सिटी में आयोजित  किये जाएंगे। जहाँ फेमिनिज्म को "it's my choice"  तक सीमित करके अपनी मांगों को उठाया जाएगा; एक इंटेलेक्चुअल वर्ग आके अंग्रेजी में भाषण देगा और फिर से सुदूर गाँव में बैठी उस महिला जो अपने खाने, रहने, चलने, घूमने, देखने, सुनने तक के बारे में निर्णय लेने से वंचित है, जो परदे में रहने को विवश है, अपनी आवाज उठाने के अधिकार से वंचित है, प्राचीन काल से पितृसत्ता के पैरों तले दबी है, तक नारीवाद अपने आप को पहुँचाने  में अक्षम पायेगा।
फेमिनिज्म या नारीवाद सिर्फ दीपिका के "IT'S MY CHOICE" तक ही सीमित नही है ये इससे कहीं आगे का विचार है; ये लड़ाई है उनके हक की जो अपने ही अस्तित्व को नहीं जी पा रहे हैं जिसे वर्षों से एक वस्तु की तरह ढककर रखा जा रहा है, क्यों महिलाओं को ही घर की इज़्ज़त समझ जाता है? क्यों हम इज़्ज़त के नाम पर उनके पैरों में बंदिशों की बेड़ियाँ डाल देते हैं? ये इज़्ज़त नहीं एक पाबन्दी है उनकी आज़ादी के लिए उनकी उठती आवाज के लिए उनके अधिकारों के लिए उनके अपने अस्तित्व के लिए।
लड़कियों को पैदा होने से पले ही मार दिया जाता है इससे बड़ा अत्याचार उनके ऊपर क्या हो सकता है? क्या वाकई में पुनर्जागरण हो चुका है?
घर में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार महिला को दिया जाए; क्या ऐसा हो सकता है? नहीं क्यों कि महिलाएं तो कम दिमाग की होती है ये पितृसत्तात्मक सोच लेके हम पैदा ही हुए हैं।
सबसे जरुरी है महिलाएं अपने आप को आर्थिक रूप से सक्षम बनाएं उसके लिए लड़ाई लड़े आवाज उठायें क्यों कि यही वो रास्ता है जहाँ से आपकी आवाज को आपके अधिकारों को मजबूती मिलेगी। आर्थिक पराधीनता आपको ग़ुलाम बनाती है और ग़ुलामों की अपनी आवाज या अपने विचार नहीं होते। पहले हमें इससे पर पाना है।
उम्मीद है हमारी सोच बदलेगी हम अपनी वर्षों पुरानी परम्परा या रूढ़ियों से बाहर निकल पाएंगे और युवा राष्ट्र में युवा विचार भी अपनाये जाएंगे।।🙏
अंतर्राष्टीय महिला दिवस की शुभकामनायें।।
#Happy_International_Womens_Day

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